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    एक ऐसा मंदिर जहां होती है कुत्ते की पूजा, नाम है कुकुरदेव मंदिर

    May 31, 2021

    छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के बालोद से लगभग 6 किलोमीटर दूर खपरी गांव स्थित है। यहां एक पूर्वमुखी मंदिर है। इस मंदिर के प्रवेश द्वार पर कुकुर यानी कुत्ते की मूर्ति है। मंदिर के गर्भगृह में एक शिवलिंग स्थित है। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर को एक स्मृति इमारत के तौर पर बनाया गया था। जिसे फणीनाग वंश के एक साहूकार ने अपने कुत्ते की याद में 14वीं से 15वीं शताब्दी के बीच बनवाया था।

    मंदिर एक कुत्ते को समर्पित है
    खपरी गांव में स्थित ‘कुकुरदेव’ मंदिर किसी देवी-देवता को नहीं बल्कि एक कुत्ते को समर्पित है। हालांकि मंदिर के गर्भगृह में शिवलिंग भी स्थापित है। लेकिन लोग इस मंदिर को कुकुरदेव के कारण ही जानते हैं। ऐसा माना जाता है कि यहां दर्शन करने से कुकुर खांसी व कुत्ते के काटने का कोई भय नहीं रहता है। मंदिर 200 मीटर के दायरे में फैला हुआ है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर दोनों ओर कुत्तों की प्रतिमा लगाई गई है। भक्त यहां भगवान शिव के साथ-साथ कुकुरदेव की भी पूजा करते हैं।

    बंजारे ने कुत्ते को साहुकार के पास गिरवी रखा था
    स्थानीय लोगों के अनुसार, यहां कभी बंजारों की बस्ती थी। इन बंजारों में से एक मालीघोरी नाम का बंजारा भी था। जिसके पास एक पालतू कुत्ता था। लेकिन अकाल पड़ने के कारण बंजारे ने अपने प्रिय कुत्ते को साहुकार के पास गिरवी रख दिया। इसी बीच साहुकार के घर चोरी हो गई। कुत्ते ने चोरों को साहूकार के घर चोरी करते हुए देख लिया और ये भी देखा की चोरों ने चोरी के माल को समीप के ही तालाब में छुपा दिया है। सुबह होने पर कुत्ते ने साहूकार को उस स्थान पर ले गया जहां चोरी का सारा सामान छुपाया हुआ था। कुत्ते के कारण साहुकार को सारा सामान मिल गया। इसके बाद साहुकार कुत्ते की वफादारी से खुश होकर अपने सारे सामान का विवरण एक कागज में लिखकर उसके गले में बांध दिया और उसे अपने मालिक के पास जाने के लिए आजाद कर दिया।

    बंजारे ने गुस्से में आ कर कुत्ते को मार डाला
    बंजारे ने कुत्ते को साहुकार के घर से लौटकर आता देख गुस्से में उसे पीट-पीटकर मार डाला। उसे लगा कि ये उसके घर से भाग कर चला आया है। लेकिन जैसे ही उसकी नजर गले में बंधे पत्र पर गई वह हैरान हो गया। उसे अपनी गलती का एहसास होने लगा। उसने कुत्ते की याद में मंदिर प्रांगण में कुकुर की समाधी बनवा दी। बाद में साहूकार ने उस कुत्ते की मूर्ति स्थापित कर दी। जिसके बाद से यह मंदिर कुकुरदेव के नाम से विख्यात हो गया। आज इस मंदिर में हजारों लोग कुत्ते के काटने के बाद आते हैं। हालांकि यहां किसी का इलाज तो नहीं होता, लेकिन स्थानीय लोग ऐसा मानते हैं कि यहां आने से पीड़ित व्यक्ति ठीक हो जाता है।