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    सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना

    May 16, 2020

    ये रो रहा है अपने सपनों पर, उन सपनों पर जो उसने बुने थे अपने बेटे के लिए। अपने भविष्य के लिए, लेकिन न बेटा रहा और न ही वो सपने। मरे हुए बेटे को देखने के लिए भी बाप तरस गया, तीन दिन लॉकडाउन में सड़कों पर दर-दर भटकता रहा। लेकिन घर का रास्ता नसीब नहीं हुआ, भला हो कुछ लोगों का, जिन्होंने उसे आखिर घर पहुंचा दिया। लेकिन ऐसा घर भी क्या, जिसमें उसका बेटा उसे दिखाई भी नहीं दिया। एक बाप अपने मरे हुए बेटे को आखिरी बार भी नहीं देख पाया।

    तुम क्या जानोगे उस दर्द को, तुम क्या महसूस करोगे उस दर्द को। दर्द महसूस करने के लिए दिल चाहिए…ये एक बाप नहीं रो रहा है, बल्कि पूरा देश रो रहा है। दहाड़े मार कर रो रहा है, बस अंतर इतना है कि जो घरों में बैठे हैं वो सुबक रहे हैं और जो सड़कों को पैदल नाप रहे हैं, उनका पसीना चीख—चीख कर जिम्मेदारों को आवाज दे रहा है।

    शहरी बाप का दर्द है कि वह बेटों की फीस कैसे भरेगा? बिजली का बिल कहां से देगा? होम लोन की किस्त कहां से भरेगा? घर में राशन कहां से लाएगा, क्योंकि इन सबको पूरा करने के लिए जो कमाई आती थी, वो या तो बंद है या फिर उस पर कैंची चल गई है। खाली जेबों में हर कोई बच्चों के लिए कुछ तलाश रहा है, लेकिन फिर मन मसोसकर खामोश है। जो सड़कों पर हैं उनकी आंखें पथराई हैं, झोलों में बच्चों के लिए कुछ भी नहीं बचा है, वह भूख शब्द को भी नहीं सुनना चाहते हैं…क्योंकि बच्चों को खिलाने के लिए जेब में पैसे नहीं हैं और झोले में खाना नहीं।

    सपने देखने का खामियाजा इतना बड़ा होता है क्या? घर से निकले थे सपने संजोकर…कुछ मजदूर हो गए और कुछ मजबूर बन गए। कुछ ने घर बनाने का काम किया और कुछ उन्हीं घरों में रहने आ गए। सब एक दूसरे का सहारा थे, लेकिन एक झटके में सभी सहारे टूट रहे हैं। सपने टूटकर बिखर रहे हैं…लौट रहे हैं घरों की ओर, सपनों का गला घोंट कर। मुश्किलों से जूझते हुए…अगर जिंदा घर तक पहुंच गए तो शायद ही कभी सपने देखने की जहमत उठाएंगे। अगर मर गए तो दुनिया के लिए भी एक सपना से ज्यादा नहीं होंगे जो लोग रात में देखकर सुबह भूल जाते हैं।

    दर्द हर ओर है, बस कोई अपना दर्द बयां नहीं कर पा रहा है। सपने उसके भी टूटे हैं, जो सबको दे रहा था और सपने उसके भी टूटे हैं जो ले रहा था। बस टूटे सपनों में कब तक खड़े हैं यह तो वक्त जाने। लेकिन इन टूटे हुए सपनों के साथ शहरों का यह कंक्रीट छोड़कर मजदूरों के साथ चले जाना ही शायद बेहतर है…क्योंकि इस कंक्रीट के जंगल में सिर्फ मनहूसियत बची है, जिंदादिली तो कब की गांव की ओर निकल गई है। सड़कों को नाप रही है, पैदल अपने हौसलों से। भगवान दुआ सिर्फ इतनी है कि इनके आखिरी सपने को कभी मरने मत देना। उन्हें उनके घर तक पहुंचना नसीब करा देना। क्योंकि अगर सपने मर गए तो उनका क्या होगा जो इनके सपनों के सहारे ही जिंदा हैं…फिर वही बात…याद रखना जिंदगी भर सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना

    सौ. शैलेन्द्र तिवारी