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    खेल खत्म नहीं हुआ है… अघोषित जंग अब शुरू होगा, चिराग को साइड कर 6 फीसदी मतदाताओं का नेता बन पाएंगे चाचा पारस?

    Jun 14, 2021

    लोजपा के पांच सांसदों का खेमा बदलने से चुनावी-राजनीतिक समीकरण और परिदृश्य में कोई बड़ा बदलाव नहीं होने वाला है. ऐसा नहीं है कि बागी खेमा बिहार में पासवान जाति के 6 फीसदी मतदाताओं का अगुआ हो जाएगा, ऐसा भी कतई नहीं होने वाला है. चार दशकों से ऊपर के कालखंड में बिहार में पासवान जाति के सर्वमान्य नेता स्व. रामविलास पासवान रहे, इसमें कोई दो राय तो नहीं ही है और रामविलास जी की मृत्यु के पश्चात चिराग पासवान के साथ पासवान जाति के मतदाता एकजुटता के साथ बने रहे, ये 2020 के विधानसभा चुनाव में साबित भी हुआ.

    चिराग बने रहेंगे दलितों का नेता?
    पशुपति कुमार पारस हों या प्रिंस राज पासवान, इन दोनों की पहचान बतौर पासवान नेता के तौर पर कभी रही ही नहीं और ना ही इनकी कोई अपनी पकड़ अपनी जाति के मतदाताओं पर है, इन दोनों की पहचान रामविलास के भाई -भतीजा के तौर पर ही रही है और इन दोनों की चुनावी नैया भी रामविलास की बदौलत ही पार लगती आई है. आज भी बिहार की पासवान जाति चिराग पासवान को ही रामविलास पासवान का असली और वाजिब उत्तराधिकारी मानती है और संकेत भी यही दर्शाते हैं कि आगे भी मानेगी. युवा नेता के तौर पर चिराग पासवान की अपनी भी एक छवि है. वहीं अलग हो रहे धड़े में से किसी भी एक सांसद की अपनी कोई पहचान नहीं है.

    भाजपा के असरदार टूल साबित हुए हैं चिराग!
    रही बात इस विभाजन से पड़ने वाले पॉलिटिक्ल इंपैक्ट की तो सत्ता के समीकरणों में इस विभाजन से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है. लोजपा विधायकविहीन पार्टी है और बिहार में इस विभाजन से कुछ नया सधने-पकने नहीं जा रहा, वहीं दिल्ली की सरकार और सियासत के संदर्भ में पांच की इस संख्या की कोई बड़ी अहमियत नहीं है. भाजपा के टेम-गेम के दांव के दृष्टिकोण से भी चिराग पासवान का चेहरा ही मायने रखता है, नीतीश कुमार का कद बौना करने के खेल में चिराग भाजपा के टूल रहे हैं और असरदार साबित भी हुए हैं .

    किसे खुश होने की जरूरत?
    ऐसे में सवाल उठा रहा है इस विभाजन की अहमियत कैसी है और इससे खुश होने की जरूरत किसे है ? इस सवाल का सीधा है जवाब है कि चिराग पासवान फैक्टर ने नीतीश कुमार को व्यक्तिगत और राजनीतिक तौर पर बड़ा नुकसान पहुंचाया है, नीतीश कुमार आज जिस तरह से कमजोर और धारविहीन हो चुके हैं, उसकी बहुत बड़ी वजह चिराग हैं और बदले की भावना से जल रहे नीतीश के दिल को इस विभाजन से जरूर ही थोड़ी ठंढक मिलेगी. विभाजन के पीछे भी नीतीश ही हैं और इस विभाजन को अंजाम दे कर नीतीश भाजपा को भी संदेश देना चाहते हैं कि मैं कमजोर तो हूं मगर पूरी तरह से चूका नहीं हूं.

    चिराग के पास क्या है विकल्प?
    एलजेपी में संकट के मौजूदा स्थिति पर नजर डालें तो इसमें आगे तीन संभावनाएं प्रमुख रूप से नजर आ रही हैं. जिसमें एक स्थिति ये हो सकती है भाजपा की ओर से चिराग को कुछ सपोर्ट मिले. ऐसा इसलिए क्योंकि अगर चिराग पार्टी से अलग हटते हैं तो उनके लिए आरजेडी और कांग्रेस दोनों ही ओर से ऑफर आ रहे हैं. भाजपा नहीं चाहेगी कि चिराग किसी भी तरह से महागठबंधन का हिस्सा बनें. ऐसे में पार्टी चिराग पासवान को साथ में लेते हुए आगे बढ़ने की कोशिश करेगी.

    दूसरा विकल्प, जिसका जिक्र खुद चिराग पासवान कर रहे हैं, वो है रीना पासवान को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने का. इसके लिए उन्हें अपनी मां रीना पासवान को राजनीति में आने के लिए मनाना होगा. माना जा रहा कि वो ऐसा करने में सफल हो सकते हैं, शायद यही वजह है कि सोमवार जब लोजपा में टूट की खबरें सामने आई तो खुद चिराग हाथ में पट्टी बंधी होने के बावजूद गाड़ी चलाकर चाचा पशुपति नाथ पारस के दिल्ली स्थित घर पहुंचे.

    भाजपा को क्या मिला?
    लोजपा में मचे सियासी घमासान पर जदयू और भाजपा, दोनों की ही निगाहें हैं. चिराग के खिलाफ हुई इस बगावत से जदयू को सीधा फायदा मिलता दिख रहा है. जानकार बताते हैं कि जिस तरह से पिछले दिनों उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी का जदयू में विलय हुआ, पशुपति पारस भी लोजपा का जेडीयू में विलय करा सकते हैं. ये बात भाजपा बखूबी समझ रही है. ऐसे में भाजपा कभी नहीं चाहेगी कि चिराग की पकड़ लोजपा में कम हो. जानकार बता रहे हैं कि पार्टी इस दिशा में जरूर कुछ प्लानिंग कर रही होगी. यानी BJP-JDU में जारी सियासी वर्चस्व की अघोषित जंग आने वाले समय में और तेज हो सकती है. ऐसे में हम कह सकते हैं असली खेल अब शुरू होगा!